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03 September 2007

दुहाई

एक दिन गमले मे अन्कुर फूटा
एक दिन माली उससे रुठा
क्यो...
रोज़ मिला उसे सूरज पानी
की शुरु उसने फिर जडे फैलानी
पहले नन्हा पौधा बना
असमन्जसता मे फिर वह तना,
शाख और पत्ते हुये घने
गमले मे पैर अब ना बने
उसका उसपे कोई जोर ना था
प्रक्रिती का नियम भी यही था

उसको जो थी जगह चाहिये
माली ने उसे नही दिलाई
गमले वाले पौधो की उसने
क्यारी मे थी लाइन लगाई

गमले मे फिर फूल खिले
फल आये और शाख झुके

माली ने फलो को बेचा
और क्यारी के फूलो को सीचा
माली ने फिर भी कुछ ना सोचा
गमले की चटकन को किया अनदेखा

वक्त ने अपना खेला खेला
गमले से जडो को बाहर ढकेला
उसने अपनी खुद जगह बनाई
सब लोगो को दी फिर छाई

अब माली की सुनो दुहाई
जो पाले उसी का कर दो नाश