माँ ने बचपन में
एक छोटी सी डायरी दी थी
जब मैं पाँचवी मे था,
स्कूल का पहला टूर था,
कहा था
इसमे लिखना
जो भी तुम देखो.
कुछ बिखरे हुए शब्दों में
टूटी हुई लाइने दर्ज़ हुई थी,
उस छोटी सी डायरी में.
वक़्त के साथ वो लाइने
संभल गयी है,
ज़िम्मेदार हो गयी है.
उसी प्रथा को आगे बढ़ाते
एक पन्ना
मैंने भी दिया
आगे की पीढी को.
आज कुछ पका है उसपे
बहुत अच्छा रंग आया है
बहुत अच्छी खुशबू है और
जायका भी अच्छा है.
आज पहला अंकुर फूटा है
दुआ करता हूँ
कुछ और भी खिलेगा
वक़्त की साखों पे
क़तरा-क़तरा
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02 September 2007
01 September 2007
come-ant कम-आन्ट
प्रोत्साहन ही
लिखने वाले का
ईधन होता है.
कुछ लोग कहते है
हम अपनी खुशी के लिए
लिखते है,
कोई पढे या न पढे
मैं नही मानता.
यहाँ
इन चिट्ठों पे
कुछ भी तो अपना नही है,
कुछ लोगो से लिया
कुछ अपना मिलाया
कुछ ज़िंदगी ने सिखाया
जो बिखर गया यही पे
कही लेख बनके
सिमट गयी कही पे
कविता बनके.
फिर क्यों न हम
ज्यादा में बटे
एक होके
क्यों न एक हो जाए
सब मिलके
फिर हमारी भी तुम्हारी
तुम्हारी भी हमारी
बस एक कोना अधिकार का ज़रुर हो
जिससे अपनी सी खुशबू आती रहे
फिर सब इकठ्ठा होंगे चीटियों की तरह
रोज़ होगी दावत विचारों की
और मैं
हटा दूंगा
comments की तख्ती
लिख दूंगा
come-ant
इंतजार नही करुंगा
क़तरा-क़तरा
लिखने वाले का
ईधन होता है.
कुछ लोग कहते है
हम अपनी खुशी के लिए
लिखते है,
कोई पढे या न पढे
मैं नही मानता.
यहाँ
इन चिट्ठों पे
कुछ भी तो अपना नही है,
कुछ लोगो से लिया
कुछ अपना मिलाया
कुछ ज़िंदगी ने सिखाया
जो बिखर गया यही पे
कही लेख बनके
सिमट गयी कही पे
कविता बनके.
फिर क्यों न हम
ज्यादा में बटे
एक होके
क्यों न एक हो जाए
सब मिलके
फिर हमारी भी तुम्हारी
तुम्हारी भी हमारी
बस एक कोना अधिकार का ज़रुर हो
जिससे अपनी सी खुशबू आती रहे
फिर सब इकठ्ठा होंगे चीटियों की तरह
रोज़ होगी दावत विचारों की
और मैं
हटा दूंगा
comments की तख्ती
लिख दूंगा
come-ant
इंतजार नही करुंगा
क़तरा-क़तरा
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