चाँदनी चौक से
बरेली का मांझा और
पतंग मगाई थी,
सोचा था
शाम तक घर
पहुच ही जाऊंगा।
मेरे से कभी
पतंग नही उड़ी।
पतंग हवा के
रुख के साथ
उड़ती हैं
और मैंने कभी
इसके रुख के साथ
रुख नही मिलाया
अलग ही चला।
सोचा था
आज
हवा के साथ उडूगा,
पर ये ना हो सका ।
आज सारे दिन
ख़बरों पे झंडा फहराया,
आज के दिन
बाक़ी दिनों से ज्यादा
काम आया।
जब दफ्तर से निकला
तो अँधेरा छा चुका था,
15 अगस्त का सूरज
मुझसे बिना मिले
जा चुका था।