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08 September 2007

सपना हो गया सपना

अर्से पहले
एक सपना देखा था
आज वो पूरा हुआ
पर
वो सपना अपना नही रहा,
जब हक़ीकत ने उसे छुआ
तो मुआ मुझे ही छोड गया

आज जब खुलती हैं
शम्पैन उसकी हर कामयाबी पे
थोडा दर्द देती हैं
पर खुश भी बहुत
हो लेता हूँ ये देख कि
जो बीज बोया था
वो आज कितनों को
छाया दे रहा

जो आग सुलगाई थी
सर्द रातों में
आज सेकती हैं कईयों को
पर ठिठुरता रहता हूँ मै ,
अकेला घूमता हूँ
इस भरी भीड़ में,
तनहाइयां समेटता हूँ
इस शोर में.

साथ चलना सबके
दूभर हो चला हैं
विश्वाश का साथ अब
दूर हो चला हैं

मै मेरे साथ रहूँ
अब यही दुआ करता हूँ
क्यों कि
मुझमें मै हूँ
तो मै हुआ करता हूँ

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: कविता, अकेला, मै, साथ, विश्वाश, दुआ, ख़ुशी, दर्द, तनहा, अकेला, भीड़, yatish, yatishjain, hindi, hindi-poem, क़तरा-क़तरा, Qatra-Qatra,

05 June 2007

एंटीवायरस


आज हर नज़र करप्ट हो गयी हैं,
इनमे वायरस आगया हैं,
इससे ना हम बचे हैं ,
ना बचेगी हमारी आने वाली पीड़ी।

काश कि ऐसा होता
कंप्यूटर के एंटी-वायरस की तरह
भगवान भी एक एंटी-नज़र,
फ़िल्टर बनाता
जिसे हम पहन लेते
बुरी नज़रों से बचने के लिए,
जो जितनी दुआ करता
उसे उतनी ही पावर का मिलता ये।

पर सुना हैं कि वायरस भी
वही बनाते हैं जो एंटी-वायरस
बनाते हैं ,
जिससे लोग उन पर विश्वास करें
और वायरस से बचने के लिए
लोग उसे खरीदें।

दुआ के लिए खुदा भी तो कहीं
ये नही कर रहा।

हाय ये क्या हुआ मुझसे,
मैंने उसपे शक किया
मै तो गया काम से ...