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09 September 2007

साजिश

रात का सपना
जब ख़त्म हो रहा था
तो सूरज ने एक साजिश की
एक किरण को भेज दिया
आखरी पहर ही देहलीज पे
रात भी बड़ी चालक
उसने न खोले अपने द्वार
सपना संजोये ही चली गयी
थाम लिया वक़्त को
अपनी बंद आखों मे
जब आँख खुली
तो चौधिया गयी
सब कुछ उजड़ चुका था
सिर्फ़ कहने को
एक नाम बाकी था
दिन के सीने पे
जल रहा था
रात की राख लिए.

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02 September 2007

अंकुर

माँ ने बचपन में
एक छोटी सी डायरी दी थी
जब मैं पाँचवी मे था,
स्कूल का पहला टूर था,
कहा था
इसमे लिखना
जो भी तुम देखो.

कुछ बिखरे हुए शब्दों में
टूटी हुई लाइने दर्ज़ हुई थी,
उस छोटी सी डायरी में.
वक़्त के साथ वो लाइने
संभल गयी है,
ज़िम्मेदार हो गयी है.

उसी प्रथा को आगे बढ़ाते
एक पन्ना
मैंने भी दिया
आगे की पीढी को.

आज कुछ पका है उसपे
बहुत अच्छा रंग आया है
बहुत अच्छी खुशबू है और
जायका भी अच्छा है.

आज पहला अंकुर फूटा है
दुआ करता हूँ
कुछ और भी खिलेगा
वक़्त की साखों पे
क़तरा-क़तरा
http://gunish.blogspot.com

28 August 2007

त्यौहार मनबंधन का

हर रिश्ता एक बन्धन है,
हर बन्धन एक रिश्ता है,
जो रोज़ रिसता है.

कोई कहता है कि
रिश्तों के बन्धन
कच्चे धागों कि तरह होते है
इन्हें संभालना बहुत ही मुश्किल है
ये बहुत नाजुक है.
किसी ने इसमे प्रेम बाँधा
किसी ने नफरत
और तो और
किसी ने इन दोनों के बीच
पुल बांधा,
पर वक्त की आंधी
कुछ ऎसी आयी की
ये बन्धन झूला बन गए,
बीच का फासला
खाई बन गयी.

पर हाँ एक रिश्ता है
जो खुला होकर भी
बहुत बांधता है,
वो है मन का.
धागे तो बहुत बांधे है
आओ मन बांधे,
फिर रोज़ होगा उत्सव
विश्वास का प्रेम का,
त्यौहार मनबंधन का.

11 August 2007

खोमचा






















सरहाने
अपने
खोमचा किताबों का
सजा लिया हैं हमने,
पहले
वक़्त ही नही मिलता था
अलमारी तक जाने का,
उनका हालचाल जानने का।
इस तंग जिन्दगी में
मसरूफ होकर भी
तन्हा हो गए हैं,
इसलिये
हाथ भर की दूरी पर
बुला लिया हैं उनको।
अब दुआ की तरह
पढता हूँ,
दवा की तरह
लिखता हूँ रोज़
क़तरा-क़तरा...

07 August 2007

बहाने वही पुराने...

कभी रिश्ते एसे हो जायेगे
जैसे किसी इमेल मे आयी हुई बेकार मेल
जो रोज आती है और अपने आप ही
चली जाती है जन्कमेल मे,
या अंगुलियां एक दम से
चली जाती डिलीट पे
सोचा नही था।

कभी मिले तो कहते थे
अमा याद भी करलिया करो,
अब याद करते है
तो कहते है तुम बिजी होगे
इसलिये तुमसे सम्पर्क नही किया,

कितने समझदार होते है ये
कहने वाले,
बिन कहे ही मेनेज करते हैं
अपनो का वक़्त,

इस तेज रफतार जिन्दगी मे
जहा फ्री टाकटइम वाले मोबाइल है
वीडियो टाक है,
ईमेल है
और नजाने कितने साधन
मेल मिलाप के,
विज्ञान ने अब
मीलो का फ़ासला
एक क्लिक की दूरी तक
सीमित कर दिया है.
पर
बहाने वही पुराने...

17 June 2007

नमन

मौन जब मरजाता हैं
तो उसमें दफ्न होता हैं
एक तूफ़ान,
जो ना जाने कितने
सवाल लिए होता हैं,
या कहे जवाब लिए होता हैं
सवालों के।
ये मौन भले ही
खामोश हो,
जिंदा हो या मरा हुआ;
मौन नही होता,
अपनी भाषा में
बहुत कुछ कहता हैं
तभी तो मन
इस मौन का
हर वक़्त करता हैं
"नमन"

02 June 2007

सिलसिला जवाबों का

किसी ने एक ख़्वाब देखा,
किसी ने इसे साकार किया,
वक़्त का लम्बा दौर तय हुआ,
लोग जुड़ते गए दिन ब दिन ,
सवालों का सिलसिला शुरू हुआ
नेट पर ,
जवाबों को उन तक
पहुंचाया गया,
सिलसिलेवार फ़हरिस्त बनी,
और एक दिन
रूप लिया इसने
किताबों का
क़तरा-क़तरा...