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10 September 2007

शब्दकार

शब्द गीत बनके बोल को अमर करते है
शब्द बोल बनके आवाज़ को अमर करते है,
शब्द बस जाते है दिलों मे धुन बनके.

आवाज़ शब्दों से ही जानी जाती है
शब्द गड़ने वाले खो जाते है
जैसे आवाज़ गुमनाम सी,
बोल बेमानी से,
धुन अनजान सी.

शब्दों का कोई काम्पटीसन नही होता
आवाजों का होता है प्रदर्शन
शब्द आत्मा है
शब्द नींव है
शब्द ही सहारा देते है
आवाज़ की दुनिया को

पर
आवाज़ क्या देती है
शब्दों को
शब्दकार को...

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: कविता, शब्द, आवाज़, नींव, आत्मा, धुन, गुमनाम, yatish, yatishjain, यतीष, hindi, poem, क़तरा-क़तरा, Qatra-Qatra,

26 August 2007

शब्द

ये ज़िंदगी शब्दों के कितनी अधीन है,
सब कुछ शब्द ही तो करते है
बच्चों की तोतली बोली बन
शब्दों ने ही कहा
ये है मेरा पहला रूप,
प्रेम को सबके सामने
शब्द ही लेके आए,


शब्द शबद बने किसी गुरू के
शब्द ही बने गीता
शब्द ही बनी कुरान
बाइबल मे भी शब्द ही बोलते है,

फिर एक साजिश हुयी
कुछ सफ़ेद पोशो की
और बनी शब्दों की
अलग अलग जात
शब्द रंग बदलने लगे
शब्दों से निकली नफ़रत

पर ये नफरत फैलाई किसने,
गीता और कुरान ने नही,
बाईबल ने नही,
कोई गुरू तो ऐसा नही कर सकता
फिर कौन ?

किसके शब्द है जो फैलाते है
ये जिहाद,
जिहाद का मतलब क्या है ,
क्या मासूम-बेगुनाहों को
मारना है जिहाद,
क्या मज़हब है इस शब्द का
क्या माने है इस शब्द के,
है कोई शब्द तो बताओ;
एहसान होगा
भगवन की इस धारा पे
अल्लाह की जमीन पे,
कोई तो बोलो एक शब्द

गर नही है कोई शब्द
तो आओ मिटा दे
शब्दों की दुनिया से
ये शब्द...

25 August 2007

निबंध The Eassy

विश्वास एक शब्द है जिसका प्रयोग समस्त विश्व करता है,
अक्सर यह रोज़मर्रा के जीवन में प्रयोग किया जाता है,
एस शब्द को लोग कार्य शैली मे देते और लेते है,
मूलतः यह आपसी रिश्तों जैसे-
दोस्त, कुलीग, भाई-बहन, माता-पिता और
व्यापार मे प्रयोग होता है,

इतिहास कारों का मानना है कि द्वापर युग से ही
विश्वास के दो साथी है 'पात्र' और 'घाती'
'पात्र' बहुत ही वफादार किस्म का साथी है और
'घाती' बहुत ही खुरपाती किस्म का साथी है,
देखने में दोनों एक जैसे लगते है पर अक्सर यह
पात्र की कि वेशभूषा में घूमता है
विश्वास श्रापित है यह कभी भी अकेला नही होता
इसलिए इसे लोग विश्वासपात्र और विश्वशाघात
के नाम से जानते है.
विश्वासघाती को पहचानना बहुत ही मुश्किल कार्य है
यह दैनिक जीवन मे किसी भी रिश्ते के रूप मे आ सकता है.
आजकल यह व्यापार और नौकरी के क्षेत्र मे घुल मिल गया है,
हम सब भी विश्वास के साथी है पर कौन से
इसे जानना बहुत ही आसान है.
हम अपने ख़ुद के मुआइने के आधार पर
की आप ने कब कब किस किस के साथ झूठ बोला है,
कब कब किसी दूसरे या अपनों को इस्तेमाल किया है,
इस प्रयोग से हम ख़ुद ही जान जाते है की हम कौन है
पात्र या घाती
अब विश्वास के दोस्त बन अपने आप को

साथ जोड़ दिया जाता है.
तत्पश्चात ख़ुद ब ख़ुद अपनी असली पहचान सामने आ जाती है
की हम कौन है विश्वास+पात्र या विश्वास+घाती

चिट्ठा जगत के कुछ महानुभाओं के मतानुसार जैसे
शास्त्रीजी के शब्दों मे
"सत्य के बिना होता है विश्वास
अंधा,
एवं विश्वास के बिना होता है सत्य
सिर्फ पाषाण !"
रचना जी के शब्दों मे
"विश्वास के बिना जीना व्यर्थ है.
विश्वास मे ही है विश्व की आस"
विपुल जैन जी के अनुसार
"विश्वास है तो संगी हैं, संगी हैं तो दुनिया है,
बाकी सब मिथ्या है।"
शशिकांत जी के अनुसार
"विश्वास मे ही अमृत और विष छिपा हुआ है
विश्वास मे ही श्रद्धा के फूल छिपे हुए होते है
टूटा तो विष का काम करता है !
बना रहा तो जीवन मे अमृत घोल देता है."
यतीष जी के शब्दों में
प्रमाण, साक्ष्य, सत्य के बिना विश्वास
झूठ के सिवा कुछ नही है.
बग़ैर साक्ष हम
जिए चले जाते हैं विश्वास,
विश्वास कुछ और नही
विष का वास हैं
जिसे हम रोज़इकट्ठा करते हैं
क़तरा-क़तरा ...


और कुछ लोगो के अनुसार विश्वास
वि + श्वास से बना है,
वि माने negative, श्वास माने सांस ...

12 August 2007

निशब्द

आज मै अकेला मिला
अपने आप से
मुद्दतो बाद,
कोई नही था
बस मेरी पुरानी
चीजें थी साथ,
जिन्हें मै रोज़
नज़रान्दाज़
करता था।
रौशनदान से झांकती
कोमल धूप,
वो कूलर नहीं था आज
जो जोर-जोर से
खर्राटे लेता था
खुदा को प्यारा हो गया
उसका पोता AC हैं आज,
TV पर आज मैंने
पावंदी लगादी थी
और बैठ गया
शांत कमरे में
एक एक कर
अलारी में सजी
अपनी अमानतों को
देखने लगा।
खड़ी किताबों के ऊपर
शब्दों के पोरुओ को
महसूस करने लगा
कि एक-एक कर
सब बोलने लगी
और मुझे
खीच ले गयी
अपनी ही दुनिया में
जहाँ ना कोई
बनावट थी,
ना कोई सजावट,
सब कच्चे-कच्चे
एहसासों की ज़मीन थी
जहाँ बहुत कुछ पक रहा था,
मै खड़ा था वहां स्तब्ध
बिल्कुल निशब्द...

08 August 2007

रसोई प्रेम की

सुना था
टैगोर के गीतों से
प्रेम झलकता था,
अभी कुछ दिन हुये
दूरदर्शन पे सूना भी,
गीत तो आज भी
वही हैं,
पर सुनाने वालों के
कान बदल गए हैं,
आज कल के कौतुहल से
सुर
अन्दर नही जा पाते।
और फिर
री-मिक्स का जमाना
जो आ गया हैं।

पाश्च्यत संगीत का मिश्रण
हमारे प्रेम संगीत में
कुछ एसा मिला
कि टैगौर की
टै हो गयी.
संगीत का तो पता नही,
सुरों में संगीन
खीच आयी हैं।
भावनायें नावों में
पलायन करगयी हैं,
शब्दों में प्यार नही
प्याज कटता हैं।

यही हैं आज
रसोई प्रेम की
जो अब रोज़ पकती हैं
क़तरा-क़तरा...

18 June 2007

पेन फ्रेंड

आज मेरी डिक्शनरी में
एक शब्द और जुड़ गया।
ये शब्द भी
कितने अजीब होते हैं,
कितने रंग दे देते हैं
रिश्तों को
अब दोस्ती को ही लो,
किसी ने आज मुझे कहा
"पेन फ्रेंड"