घर में कई किताबें
अपने बिछड़ो से
मिलने को तरस रहीं थी,
कुछ दिन पहले ही
एक एनाय्क्लोपीदीया
मुझसे कह रहा था
कहॉ छोड़ आये हो
मेरा एक हिस्सा,
जब तुम लाए थे मुझे
अपने घर,
तो कहा था
अगली बार
पूरा कर दूंगा तुम्हें ।
आज एक दशक से
ज्यादा हो गया।
कल किसी बहाने में गया था
उन रास्तों पे,
नये ज़माने की चमक से
चमक रही थी सारी चीजें,
बसों की भीड़ अब
मेट्रो में चलती हैं,
सेंट्रल पार्क को चिड़ाता
एक और पार्क बन गया हैं
और वो फेरी वाले
ना जाने कहॉ गुम हो गए,
जो सजाते थे
पुरानी सोहबतें।
जो बेचते थे
पुरानी किताबें...
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04 August 2007
17 June 2007
रिश्ते
कल आज पर निर्भर हैं
और बीते हुये कल पर आज,
जिन्दगी का उसूल हैं।
पर जिस रस्ते से
होता हुआ ये जाता हैं
वहां एक डोर
जिसे रिश्ते कहते हैं
बांधे रहती हैं।
हम इन्हें
सींचते तो ज़रुर हैं
पर इनका
पक्का पन-कच्चा पन
हमारे हाथ
नहीं होता।
पर इन सबके साथ
कुछ रिश्ते
ऐसे होते हैं
अद्रश्य से,
अनबंधे से
जो देते हैं जीं को सुकून,
देते हैं अपना पन।
क्यों ना हम
अपनी सोच की
उस रेखा को मिटा दें
जो खिचती हैं
हरदम मन पर,
क्यों ना हम
उन हवाओं से ही
खुश होलें
जो देती हैं
अपने होने की ठंडक।
क्या हुआ कि वो
सामने नहीं हैं,
पर हम तो हो सकते हैं
सामने उसके हरदम
कुछ खुले हुये रिश्ते
बहुत बांधते हैं मन को...
और बीते हुये कल पर आज,
जिन्दगी का उसूल हैं।
पर जिस रस्ते से
होता हुआ ये जाता हैं
वहां एक डोर
जिसे रिश्ते कहते हैं
बांधे रहती हैं।
हम इन्हें
सींचते तो ज़रुर हैं
पर इनका
पक्का पन-कच्चा पन
हमारे हाथ
नहीं होता।
पर इन सबके साथ
कुछ रिश्ते
ऐसे होते हैं
अद्रश्य से,
अनबंधे से
जो देते हैं जीं को सुकून,
देते हैं अपना पन।
क्यों ना हम
अपनी सोच की
उस रेखा को मिटा दें
जो खिचती हैं
हरदम मन पर,
क्यों ना हम
उन हवाओं से ही
खुश होलें
जो देती हैं
अपने होने की ठंडक।
क्या हुआ कि वो
सामने नहीं हैं,
पर हम तो हो सकते हैं
सामने उसके हरदम
कुछ खुले हुये रिश्ते
बहुत बांधते हैं मन को...
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