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22 November 2007

क़तरा-क़तरा अब अपने घर में

दोस्तो क़तरा अब अपने घर मे पहुच गया है और इसका नया नाम
Qatra-Qatra.yatishjain.com/ है,
आपके सुझाव, टिप्पणिया हमेशा मेरे लिए प्रेरणा श्रोत रही है आशा है आगे भी आप मुझे हौसला देते रहेंगे.
आभार

02 September 2007

अंकुर

माँ ने बचपन में
एक छोटी सी डायरी दी थी
जब मैं पाँचवी मे था,
स्कूल का पहला टूर था,
कहा था
इसमे लिखना
जो भी तुम देखो.

कुछ बिखरे हुए शब्दों में
टूटी हुई लाइने दर्ज़ हुई थी,
उस छोटी सी डायरी में.
वक़्त के साथ वो लाइने
संभल गयी है,
ज़िम्मेदार हो गयी है.

उसी प्रथा को आगे बढ़ाते
एक पन्ना
मैंने भी दिया
आगे की पीढी को.

आज कुछ पका है उसपे
बहुत अच्छा रंग आया है
बहुत अच्छी खुशबू है और
जायका भी अच्छा है.

आज पहला अंकुर फूटा है
दुआ करता हूँ
कुछ और भी खिलेगा
वक़्त की साखों पे
क़तरा-क़तरा
http://gunish.blogspot.com

01 September 2007

come-ant कम-आन्ट

प्रोत्साहन ही
लिखने वाले का
ईधन होता है.
कुछ लोग कहते है
हम अपनी खुशी के लिए
लिखते है,
कोई पढे या न पढे
मैं नही मानता.

यहाँ
इन चिट्ठों पे
कुछ भी तो अपना नही है,
कुछ लोगो से लिया
कुछ अपना मिलाया
कुछ ज़िंदगी ने सिखाया
जो बिखर गया यही पे
कही लेख बनके
सिमट गयी कही पे
कविता बनके.

फिर क्यों न हम
ज्यादा में बटे
एक होके
क्यों न एक हो जाए
सब मिलके

फिर हमारी भी तुम्हारी
तुम्हारी भी हमारी

बस एक कोना अधिकार का ज़रुर हो
जिससे अपनी सी खुशबू आती रहे
फिर सब इकठ्ठा होंगे चीटियों की तरह
रोज़ होगी दावत विचारों की
और मैं
हटा दूंगा
comments की तख्ती
लिख दूंगा
come-ant
इंतजार नही करुंगा
क़तरा-क़तरा

31 August 2007

शांती

शांती ढूढता हैं हर कोई
हर समाज, मज़हब, देश
ये सारी कायनात,
बंधे हुये हैं
स्वतंत्र नही कर पाते
अपने आप को।

हम सब बटे हुये हैं
ज़मीन के
किसी टुकडे की तरह
और ज़मीन की छाती
छलनी हैं
लकीरों से।
कोई भी लकीर हिलती हैं
तो संगीने खिच जाती हैं
आतिशबाजियां होती हैं
अशान्ती और बड़ जाती हैं।

कहाँ मिलेगी शांती
पता नही,
पता हैं तो बस इतना,
अपने आप में हैं ये,
और इसे ढूढ़ना हैं मुश्किल।

ये जितनी पास आती हैं हमारे
हम उतना दूर होते जाते हैं
रोज़ इससे
क़तरा-क़तरा

29 August 2007

ग्रहण

आज चाँद फिर आधा हो गया
आज फिर
एक रिश्ते को ग्रहण लगा
जो कभी देता था शीतलता
आज किसी की छाया मे आगया.

चाँद का ग्रहण तो हट जाएगा
कुछ देर में
पर रिश्ते का ग्रहण...

पिछली बार जो लगा था
अब तक नही हटा
और कितने लगेंगे
ग्रहण रिश्तों को

अब तो
रिश्ता सा हो गया है
ग्रहण से,
रोज़ लगता है
क़तरा-क़तरा

25 August 2007

निबंध The Eassy

विश्वास एक शब्द है जिसका प्रयोग समस्त विश्व करता है,
अक्सर यह रोज़मर्रा के जीवन में प्रयोग किया जाता है,
एस शब्द को लोग कार्य शैली मे देते और लेते है,
मूलतः यह आपसी रिश्तों जैसे-
दोस्त, कुलीग, भाई-बहन, माता-पिता और
व्यापार मे प्रयोग होता है,

इतिहास कारों का मानना है कि द्वापर युग से ही
विश्वास के दो साथी है 'पात्र' और 'घाती'
'पात्र' बहुत ही वफादार किस्म का साथी है और
'घाती' बहुत ही खुरपाती किस्म का साथी है,
देखने में दोनों एक जैसे लगते है पर अक्सर यह
पात्र की कि वेशभूषा में घूमता है
विश्वास श्रापित है यह कभी भी अकेला नही होता
इसलिए इसे लोग विश्वासपात्र और विश्वशाघात
के नाम से जानते है.
विश्वासघाती को पहचानना बहुत ही मुश्किल कार्य है
यह दैनिक जीवन मे किसी भी रिश्ते के रूप मे आ सकता है.
आजकल यह व्यापार और नौकरी के क्षेत्र मे घुल मिल गया है,
हम सब भी विश्वास के साथी है पर कौन से
इसे जानना बहुत ही आसान है.
हम अपने ख़ुद के मुआइने के आधार पर
की आप ने कब कब किस किस के साथ झूठ बोला है,
कब कब किसी दूसरे या अपनों को इस्तेमाल किया है,
इस प्रयोग से हम ख़ुद ही जान जाते है की हम कौन है
पात्र या घाती
अब विश्वास के दोस्त बन अपने आप को

साथ जोड़ दिया जाता है.
तत्पश्चात ख़ुद ब ख़ुद अपनी असली पहचान सामने आ जाती है
की हम कौन है विश्वास+पात्र या विश्वास+घाती

चिट्ठा जगत के कुछ महानुभाओं के मतानुसार जैसे
शास्त्रीजी के शब्दों मे
"सत्य के बिना होता है विश्वास
अंधा,
एवं विश्वास के बिना होता है सत्य
सिर्फ पाषाण !"
रचना जी के शब्दों मे
"विश्वास के बिना जीना व्यर्थ है.
विश्वास मे ही है विश्व की आस"
विपुल जैन जी के अनुसार
"विश्वास है तो संगी हैं, संगी हैं तो दुनिया है,
बाकी सब मिथ्या है।"
शशिकांत जी के अनुसार
"विश्वास मे ही अमृत और विष छिपा हुआ है
विश्वास मे ही श्रद्धा के फूल छिपे हुए होते है
टूटा तो विष का काम करता है !
बना रहा तो जीवन मे अमृत घोल देता है."
यतीष जी के शब्दों में
प्रमाण, साक्ष्य, सत्य के बिना विश्वास
झूठ के सिवा कुछ नही है.
बग़ैर साक्ष हम
जिए चले जाते हैं विश्वास,
विश्वास कुछ और नही
विष का वास हैं
जिसे हम रोज़इकट्ठा करते हैं
क़तरा-क़तरा ...


और कुछ लोगो के अनुसार विश्वास
वि + श्वास से बना है,
वि माने negative, श्वास माने सांस ...

22 August 2007

विश्वास

जीवन का सबसे बडा झूठ क्या हैं,
क्या हैं जिसके आगे कुछ दिखाई नही देता,
क्या हैं जिसकी क़ैद मै हैं सत्य,
और सत्य तभी सामने आता हैं
जब टूटता हैं वह।

"विश्वास "

विश्वास सत्य नही;
सत्य हैं अनुभव,
विश्वास की सत्ता जहाँ ख़त्म होती हैं
वहां से शुरू होता हैं सत्य का अनुभव।
नई संभावनाओं के लिए विश्वास
सबसे बड़ी अड़चन हैं।

बग़ैर साक्ष हम
जिए चले जाते हैं विश्वास,
विश्वास कुछ और नही
विष का वास हैं
जिसे हम रोज़
इकट्ठा करते हैं
क़तरा-क़तरा ...

21 August 2007

ईमेल

एक ईमेल ने कहा कि
मै हीं हूँ तुम्हरी कविता में
पुरानी यादों मे;
कुछ अच्छी यादों मे,
मै वहां हूँ।
चाहे स्म्रति दुखद हो
पर मै हूँ तुम्हारे साथ;
तुम्हारी कविता में ।
अपने आप को पा के
बहुत अच्छा लगता है।
भले ही कोई
न समझे कि तुम
किसके बारे मे लिख रहे हो,
इससे मै अच्छा मेहसूस करता हू,
अपना खयाल रखना
ई मेल का जबाव
ई मेल से देना।

आज मै
जिस मेल में बैठा हू
वो रेल है जिंदगी की
जिसमे रोज़ लोग चड़ते है
और उतर जाते है
अगले स्टेसन पे।
स्म्रतियाँ साथ रह जाती है,
लोग भूल जाते है
कि इस आधुनिक युग मे
आज़ हर चीज को
सामने लाया जा सकता है.

मुझे मेल लिखना नही आता
ना ही इसका शिस्टाचार,
ये जो लिखा है ये वाकये है
उस मेल के
जिसमे मै बैठा हूँ
और रोज़ करता हूँ
उन यादों का सामना
क़तरा-क़तरा...

11 August 2007

खोमचा






















सरहाने
अपने
खोमचा किताबों का
सजा लिया हैं हमने,
पहले
वक़्त ही नही मिलता था
अलमारी तक जाने का,
उनका हालचाल जानने का।
इस तंग जिन्दगी में
मसरूफ होकर भी
तन्हा हो गए हैं,
इसलिये
हाथ भर की दूरी पर
बुला लिया हैं उनको।
अब दुआ की तरह
पढता हूँ,
दवा की तरह
लिखता हूँ रोज़
क़तरा-क़तरा...

08 August 2007

रसोई प्रेम की

सुना था
टैगोर के गीतों से
प्रेम झलकता था,
अभी कुछ दिन हुये
दूरदर्शन पे सूना भी,
गीत तो आज भी
वही हैं,
पर सुनाने वालों के
कान बदल गए हैं,
आज कल के कौतुहल से
सुर
अन्दर नही जा पाते।
और फिर
री-मिक्स का जमाना
जो आ गया हैं।

पाश्च्यत संगीत का मिश्रण
हमारे प्रेम संगीत में
कुछ एसा मिला
कि टैगौर की
टै हो गयी.
संगीत का तो पता नही,
सुरों में संगीन
खीच आयी हैं।
भावनायें नावों में
पलायन करगयी हैं,
शब्दों में प्यार नही
प्याज कटता हैं।

यही हैं आज
रसोई प्रेम की
जो अब रोज़ पकती हैं
क़तरा-क़तरा...

02 June 2007

सिलसिला जवाबों का

किसी ने एक ख़्वाब देखा,
किसी ने इसे साकार किया,
वक़्त का लम्बा दौर तय हुआ,
लोग जुड़ते गए दिन ब दिन ,
सवालों का सिलसिला शुरू हुआ
नेट पर ,
जवाबों को उन तक
पहुंचाया गया,
सिलसिलेवार फ़हरिस्त बनी,
और एक दिन
रूप लिया इसने
किताबों का
क़तरा-क़तरा...